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माता वैष्णोदेवी यात्रा

कई दिनों से मन में एक लालसा थी,माता के दर्शन करने की। मैं मेरे आस पास के लोगों को हमेशा आते जाते देखता था,कई बार लोगों से माता का प्रसाद भी मिल जाता था। लोगों को देखकर, उनसे प्रसाद लेकर मेरे मन की लालसा और अधिक बढ़ जाती थी। बस संयोग नहीं बन पाता था।कई बार लोगों के साथ जाने की बाते निकलती थी, फिर सुबह होने के बाद वो रात कि बात बन कर रह जाती थी। स्वभावतः हठी होने के कारण #२०२० में वो दिन भी आ गया जब मन में ठानी की इस वर्ष मुझे यात्रा करनी है,फिर संयोग भी बन गया। संध्या समय में विचार किया ,रात्रि में यात्रा की तैयारी प्रारंभ कर दी। #मकरसंक्रांति के दूसरे दिन रात ११ बजे घर से यात्रा के लिए निकला।लगभग रात्रि के ००:०० बजे तक नई दिल्ली रेलवे के प्रतीक्षालय में पहुंच कर सुबह की प्रतीक्षा करने लगा। प्रतीक्षालय पूरी तरह से यात्रियों से भरा हुआ था। रात के साथ ठंड भी बढ़ती जा रही थी, ऐसे में मैंने प्रतीक्षालय में ही रहकर रात बिताना सही समझा। मुझे एक खाली सीट मिल गई ,मै अपना बैग वहीं रख कर भोर होने की राह देखने लगा। थोड़ी देर बाद नींद आ गई तो वहीं सो गया।

प्रातः ५:०० बजे नींद खुली , ट्रेन की आने की सूचना रेलवे द्वारा प्रसारित हो रही थी । निवृत होकर,अपना बैग उठाकर मै प्लेटफॉर्म की ओर चल दिया।लगभग ५:३० बजे तक “#वन्देभारतएक्सप्रेस” प्लेटफार्म पर आकर लग गई, लगभग १५ मिनट बाद ट्रेन का दरवाजा खुला । फिर सभी यात्री के साथ मै भी ट्रेन में सवार हुआ।

अपने निहित समय ६:०० बजे ट्रेन नई दिल्ली स्टेशन से #कटरा के लिए प्रस्थान कर गई। ट्रेन खुलने के साथ मन में एक नई स्फूर्ति सी दौड़ गई और उसी स्फूर्ति से ट्रेन भी पटरी पर दौडी जा रही थी। सुबह का नाश्ता और दोपहर का भोजन ट्रेन में ही कर लिया।

क्योंकी यात्रा में अकेला था तो रात की बची नींद ट्रेन पे पूरी कर ली। जब आंख खुली तो ट्रेन जम्मू स्टेशन से प्रस्थान कर रही थी। जम्मू से ट्रेन चलने के बाद ट्रेन की खिड़की से खुबसूरत पहाड़ और उसपे जमी उजली सी बर्फ दूर से बहुत ही खुबसूरत छटा बिखेर रही थी जिन्हें देख मन प्रफुल्लीत हो रहा था।

जीवन में दूसरी बार बर्फ के चादर से ढके पहाड़ों को इतने करीब से देख रहा था। पर इस बार मन में एक अलग ही ऊर्जा प्रवाहित हो रही थी।

जब ट्रेन की खिड़की से बर्फ से ढके पहाड़ कभी पास कभी दूर दिख रहा था तो उसे देखने में एक अलग मज़ा आ रहा था । फिर अचानक ट्रेन सुरंग में फिर बाहर ,फिर जंगल के बीच ,फिर पहाड़ के बीच में इतने सारे दृश्य एक साथ जिन्हें में मन में समाते जा रहा था।

#वंदेभारत

कई सुरंगों से होकर, जंगलों और पहाड़ों को चीर कर बनाए रास्ते से होकर ट्रेन अपने गंतव्य पे दोपहर के १४:०० बजे पहुंच चुकी थी।

#कटरा स्टेशन आ चुका था।सभी यात्रियों के साथ मै भी उतर गया। सभी ने उतरते के साथ माता शेरावाली का जयकारा लगाया। और #जयमातादी का नाम लेकर मै भी ट्रेन से उतरा। उतर कर स्टेशन की खूबसूरती का कायल हो गया। चारो तरफ पहाड़ियों से घिरा स्टेशन। थोड़ी देर स्टेशन से दूर पहाड़ों को देखता रहा। फिर प्लेटफॉर्म से बाहर जाने लगा । बाहर निकलने से पहले यात्रा की पर्ची की कतार में लग कर माता वैषणोदेवी यात्रा की पर्ची कटाई।फिर स्टेशन से बाहर निकल गया। स्टेशन का नज़ारा इतना मनमोहक था मै यहां शब्दों में नहीं बता पा रहा हूं।

स्टेशन से पर्ची लेने के बाद बाहर टैक्सी स्टैंड गया। थोड़ी देर वहां लोगों को देखा ,टैक्सी और ऑटो का किराया मालूम करने के बाद स्टेशन परिसर से बाहर निकल गया ।

परिसर से बाहर निकलते ही एक ऑटोरिक्शा वाला मिल गया जिसने ₹१०० किराए में बाण गंगा तक छोड़ने के लिए तैयार हो गया।रास्ते में उसने पूछा” साहब पहली बार आए हो?”

मैंने हां उत्तर दिया । फिर उसने कहा ” साहब वैसे किराया तो ₹२५० है लेकिन मै उधर ही लौट रहा था अपनी ड्यूटी खत्म करके ,आपको देखा आप अकेले है और किसी ऑटों – टैक्सी में नहीं बैठकर स्टैंड से बाहर आ गए इसलिए आपसे सिर्फ ₹१०० किराया ले रहा हूं। ये सुन कर एक आम आदमी की तरह मेरे मन में भी संतोष मिला कि ₹१५० बच गए।यहां ऑटो वाले की बातों से एक बात का पता चल गया कि मुझे जाने के बाद स्टेशन परिसर से बाण गंगा तक का किराया ₹२५० ही बताना है ।जिससे ऑटो वालों का मार्केट रेट खराब ना हो और आप ₹२५० देने में अपने आप को ठगा हुआ ना समझे। मुझे ₹१०० में ऑटो मिलना बस एक संयोग था।

ऑटोरिक्शा से पहले स्टेशन परिसर के बाहर एक होटल एजेंट भी मिला जो मिलते ही बड़े प्यार से टोह लेने लगा कि, आप कितने लोग है? होटल चाहिए कि नहीं? होटल से बाण गंगा तक कैब जैसे ऑफर बताने लगा। क्योंकि मै पैदल चल रहा था इसलिए वो एजेंट भी मेरे साथ चल कर ही अपना ऑफर बता रहा था। अभी मै पूरा ऑफर सुन भी नहीं पाया था तब तक मुझे ऑटो वाले भाईसाहब ने आवाज दे दी और पूछा साहब बाणगंगा जाना है? और मै ने किराया पूछा तो उसने ₹१०० कहा और मै एजेंट को वहीं छोड़ कर उस ऑटोरिक्शा में बैठ कर बाणगंगा के लिए प्रस्थान कर गया।

ऑटोरिक्शा से मुझे बाणगंगा पहुंचने में लगभग १४ मिनट लगे। इसी बीच ऑटोरिक्शा चालक ने अपने व्यक्तित्व से परिचय कराया साथ ही अपने सेवा भाव दिखाकर व्यापारिक धरम कि रक्षा कर उसने मेरा दिल जीत लिया। बाणगंगा में मुझे उतारकर अपने पैसे लेकर वो अपनी राह चला गया।

बाणगंगा पहुंच कर मैंने सबसे पहले वहां का वातावरण देखा। सुहाना मौसम, शूद्ध हवा, जंगल,पहाड़ और पहाड़ों पे जाते हुए रास्ते ,सचमुच प्रकृति की अनुपम छटा देख कर मेरा शरीर और आत्मा दोनों झूम रहे थे। शरीर का एक एक रोमा नाच रहा था।

बाणगंगा के प्रवेशद्वार के बाहर कई दुकानें लगी हुई है । मैंने एक दुकान से एक जोड़ी मौजे,प्रसाद और चढ़ाई का सहारा एक लाठी खरीदा। मुझे पहले से नहीं पता था कि प्रसाद भवन के पास मिलता है इसलिए मैंने पहले ही प्रसाद खरीद लिया। अब मैंने प्रवेशद्वार को प्रस्थान किया।प्रवेश द्वार पे यात्रा पर्ची एवम सामान कि जांच करके लोगों को अंदर जाने दिया जा रहा था जिसके कारण वहा लोगों की थोड़ी भीड़ थी जो एक पंक्ति में होकर आगे बढ़ रही थी।सामान की जांच सुरक्षा उपकरणों से की जा रही थी और पर्ची की जांच दर्शनार्थी कि गणना के लिए की जा रही थी इसलिए अगर आप भी कभी माता वैष्णो देवी जाए तो सुरक्षा एवम पर्ची जांच में पंक्ति में लग कर सहयोग करे।

पर्ची दिखा कर मै प्रवेश द्वार से माता वैष्णोदेवी के प्रांगण में प्रवेश किया। अब मेरे सामने भवन तक की चढ़ाई थी। रास्ते के दोनों तरफ प्रसाद, कपड़े,मसाज,होटल एवम चाय की दुकानें थी। मैंने चढ़ाई शुरू कर दी । शुरुआत में ही मुझे बघ्घी,घोड़े और खच्चर वाले दिखे जिनपर बैठ कर भी आप भवन तक जा सकते है। क्योंकी मुझे चल कर जाना था इसलिए मैंने इन से किराया नहीं पूछा और चलने लगा ।थोड़ी दूर जाकर मुझे बाणगंगा नदी दिखी, और मै नदी में अल्पस्नान कर के चढ़ने लगा। थोड़ी दूर चढ़ने पर मुझे सीढ़ियां दिखी मैंने उन सीढ़ियों का रास्ता ले लिया।थोड़ी देर बाद २०-१४ सीढ़ी चढ़ने के बाद सांसे फूलने लगी । फिर मै धीरे धीरे एक -एक सीढ़ी की चढ़ाई शुरू की । बीच में एक गन्ने के रस की दुकान में गन्ने का रस पिया फिर सीढ़ी चढ़ने लगा।वो सीढ़ियां जहां पे खत्म हुई वहा प्रथम दर्शन का मंदिर था। मैंने वहा दर्शन किया फिर आगे की चढ़ाई शुरू की।अब मैंने सीढ़ियों को हाथ जोड़े और रास्ते से चढ़ने लगा । जय माता दी का जाप कर के रास्ते चढ़ने में मत पूछिए कितना आनंद आ रहा था । जय माता दी का जाप करता रहा और रास्ता चढ़ता रहा ,बीच बीच में घोड़े और खच्चर के साथ रेस भी लगा लेता था।कब अर्धकुंवारी पहुंचा पता भी नहीं चला ।शायद शाम के ६ बज रहे होंगे।

अर्धकुंवारी पहुंच कर मैंने अपना फोन चालू किया ,अपनी बुआ से बात की आगे का मार्गदर्शन कर कॉल काट कर फोन को सेल्फिस्टिक में लगाया। फिर कुछ सेल्फी ली। आप भी देखिए।

अर्धकुंवारी से सेल्फी और तस्वीरें खींचने के बाद अर्धकुंवारी दर्शन की पर्ची कटाई जो मुफ्त थी। यहां पर्ची पर ग्रुप का क्रमांक लिखा होता है । अर्धकुंवारी मंदिर में एक बार में ५० लोगो के एक ग्रुप को प्रवेश दिया जाता है। फिर वो ५० लोगो का समूह एक एक कर माता के गर्भ गृह के दर्शन करते है जिसमें ५० लोगो को दर्शन करने में लगभग २ घंटे का समय लगता है और २ घंटे बाद अगला ग्रुप जाता है ।यह प्रक्रिया रात दिन चलती रहती है ।सिर्फ आरती के समय सुबह और शाम एक एक घंटे के लिए रोकी जाती है । मेरी पर्ची के नंबर एवम दर्शन को गए समूह के नंबर के हिसाब से मेरी बारी अगले दिन करीब १० बजे के आस पास आनी थी। मैंने पर्ची जेब में संभाल कर रखा। और भवन की यात्रा शुरू की।

अर्धकुंवारी से भवन तक कई रास्ते जाते हैं। पर जब मै गया था तब सिर्फ पुराने रास्ते को छोड़ कर बाकी सभी रास्ते बंद थे।

मैंने पुराने रास्ते से ही चढ़ाई शुरू कर दी।जय माता दी का जाप करता रहा और चढ़ता रहा। कुछ ऊपर चढ़ने के बाद कुछ श्रधालुओं को बिना जूते चप्पल के जाते देखा। तो मेरा मन जूते उतारने को करने लगा ,लेकिन मैंने अपने मन को समझाया और चढ़ाई चढ़ता गया । फिर जब हेलीपैड का नामपट्ट देखा तो वहां बैठने का मन हुआ। मै वहां बैठ गया । १० मिनट बैठने के बाद वहीं चाय की दुकान से नींबू की चाय पी।और फिर से मैंने लोगो को नंगे पैर चढ़ते देखा।रात हो चली थी,ठंड भी धीरे धीरे बढ़ रही थी पर इस बार मै अपने आप को समझा ना सका और जूते खोल कर कमर में बांध लिए। और आगे की चढ़ाई भवन तक नंगे पैर पूर्ण किया ।

लगभग १० बजे तक भवन के पास पहुंचा ,सामने कुछ दूर पर माता का भवन दिख रहा था , घोड़े एवं खच्चर वाले लोगो को उतार रहे थे । वहा से माता के भवन तक अब ढलान थी। भवन तक की चढ़ाई पूर्णतय पूरी हो चुकी थी,ढलान को पार कर अब मै भवन के प्रांगण में था।भवन के प्रांगण में सबसे पहले मैंने लोगो को प्रसाद खरीदते देखा, मैंने वहा पूछा यहां कौन सा प्रसाद है? तो लोगो ने बताया नारियल के गोले जो माता को चढ़ता है वो यही मिलता है और वो श्राइन बोर्ड की दुकान थी। मैंने वहा से प्रसाद खरीदा। फिर गेस्ट हाउस का पता करने लगा ताकि नहा लू। लेकिन वहा गेस्ट हाउस लोगो से भरा हुआ था ,फिर मैंने किसी से स्नान घर के बारे में पूछा तो मुझे किसी सज्जन ने द्वार संख्या ४ के सामने स्नान घर के बारे में बताया मैंने तुरंत स्नान घर जाकर सबसे पहले पूर्ण स्नान किया। पानी काफी बर्फीला लग रहा था। बदन पे गिरते ही मानो आत्मा को भी भिगो दिया। स्नान के बाद मैंने कपड़े बदले फिर अपना सामान और जूते लॉकर में रख कर भवन की ओर माता के दर्शन के लिए पंक्ति में लग गया। पंक्ति धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। जैसे जैसे पंक्ति आगे बढ़ रही थी, भवन नजदीक आता जा रहा था ,मन में श्रद्धा जागती जा रही थी,खुशी बढ़ती जा रही थी।अंततः द्वार पे पहुंचा। द्वार पे द्वारपाल सभी की सुरक्षा कारण से तलाशी लेकर उनको प्रवेश दे रहें थे।मेरी भी तलाशी ली मेरे पास मेरा मोबाइल मेरी जेब में मिला , उन्होंने कहा इसे भी लॉकर में रख कर आओ , मै द्वार से लौट कर मोबाइल लॉकर में रखने चला गया ।मोबाइल लॉकर में रख कर फिर से पंक्ति में लग गया। द्वार पे फिर उन्हीं सज्जन ने मेरी तलाशी ली और इस बार मुझे भवन में प्रवेश मिल गया । मत पूछो क्या अनुभव था ।उस समय की प्रसन्नता यहां शब्दों मै नहीं लिख सकता। माता की गुफा के दर्शन किए। वहां बैठ कर जाप किया फिर पिंडी दर्शन के लिए आगे बढ़ा। फिर मानव निर्मित गुफा से होकर पिंडी दर्शन किए। फिर भवन से बाहर निकल के प्रसाद लिया । प्रसाद लेकर लॉकर से सामान लिया। अब करीब रात के ११:०० बज रहे थे । मै बिना समय बर्बाद किए भैरोनाथ की चढ़ाई के लिए चल दिया। ठंड इतनी अधिक थी की एक बार मन किया भैरोनाथ की चढ़ाई के लिए घोड़ा या खच्चर ले लूं फिर मैंने अपने मन को समझाया और जय माता दी का जयकारा लगा कर पैदल ही चढ़ाई शुरू कर दी। लगभग ११:४५ तक मैंने चढ़ाई पूरी कर की। चढ़ाई के आखरी पड़ाव में भैरोनाथ का मंदिर जब दिखने लगा तो पैर उठाना भी भारी लग रहा था। रास्ते में बर्फ भी गिरी थी इसलिए ठंड में एक एक कदम भारी पड़ रहा था फिर मुझे सीढ़ी दिखी और मैंने मंदिर के लिए सीढ़ी का रास्ता चुना । एक एक सीढ़ी चड़कर मै भैरोनाथ के मंदिर पहुंचा। वहा श्राइन बोर्ड की दुकान से प्रसाद लिया । प्रसाद लेकर अपने बैग और जूते वहा पे बैठे आग सेक रहीं कुछ लड़कियों के पास निगरानी के लिए रख कर भैरो नाथ के दर्शन किए ।

कहते है भैरो नाथ के दर्शन के बिना यात्रा पूरी नहीं होती। तो दर्शन मैंने कर लिया । वहा भैरवनाथ के साथ ही बजरंगबली के भी दर्शन हुए। दर्शन कर के आग के पास कुछ देर बैठ अपने हाथ पांव गर्म किए। फिर जूते पहने। अब भूख लग रही थी तो वहीं से आलू के पकोड़े लेकर साथ में एक कप चाय लिए। सर्द भरी हवाओं में गरमा गर्म आलू के पकोड़े और फिर गर्म चाय ने शरीर और आत्मा दोनों को ताज़ा कर दिया ।

रात के लगभग ००:०० बज रहे होंगे। अंधेरे में दूर का कुछ दिख नहीं रहा था,रुकने की व्यवस्था भी मैंने की नहीं थी और अब बर्फ के कारण ठंड भी बढ़ती जा रही थी। मैंने अब नीचे उतरने का निश्चय किया।और भैरवनाथ मंदिर के सामने का रास्ता उतरने के लिए चुना। रास्ते में बर्फ गिरी हुई थी जिसे काफी फिसलन भी मिल रहा था।एक जगह मेरा पैर फिसला और मै गिर गया। फिर उठ कर अपने कपड़े झाड़े। और थोड़ी देर आराम किया। वहां चित्र भी निकला।

चित्र निकालने के बाद पुनः नीचे की ओर चलने लगा। लगातार चलने के बाद लगभग १:४५ के करीब अर्धकुंवारी पहुंचा।वहा मैंने देखा लोग कम्बल ओढ कर सो रहे थे और कुछ लोग आग ताप रहे थे तो कुछ लोग अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। मैंने पहले अपना सामान और प्रसाद का थैला लॉकर में रखा फिर वहा आग के पास प्रतीक्षा कर रहे लोगों के साथ बैठ कर आग तापने लगा। लगभग आधे घंटे तक बैठने के बाद अगले समूह को अंदर जाने की अनुमति मिली। रात होने की वजह से उस समूह में जाने वाले कुछ लोग सो रहे थे ,वहां मौजूद प्रहरी ने आवाज लगाई और कोई है दर्शन करने वाला इसके बाद दर्शन प्रातः आरती के बाद कराई जाएगी। मैंने प्रहरी को अपनी पर्ची दिखाई तो उसने मुझे कहा आपकी बारी तो नहीं है पर अभी अंदर जगह है इसलिए आप चले जाओ दर्शन कर लो। मैंने बिना देर किए अपनी बेल्ट उतारकर बाहर रख दिया जिसे लॉकर में रखना भूल गया था और अन्दर चला गया। अंदर गुफा जिसे गर्भ गृह कहते है के बाहर लोगों को बिठाया गया था और एक बार में एक व्यक्ति को उसमे भेजा जाता था । जब वह व्यक्ति दूसरी और निकल जाता तभी दूसरे व्यक्ति को प्रवेश मिलता था। यहां लगभग दो घंटे बैठने के बाद मेरी बारी भी आ गई। मैंने भी गर्भ गृह में प्रवेश किया। प्रवेश कर पता लगा कि इसे गर्भ गृह क्यों कहते है। सचमुच जैसे शिशु माँ के गर्भ में जिस तरह रहता है एक पल को वहीं अनुभव मुझे भी मिला।गर्भगृह से दर्शन कर मै बाहर आ गया। बाहर आ कर लॉकर से सामान लेकर वहीं चाय भी पी।

चाय पीकर फिर आगे उतरने लगा।प्रातः ६:०० बजे तक मै बाणगंगा पहुंच चुका था। बाणगंगा पहुंचते ही निकास द्वार से निकासी की ओर ऑटो स्टैंड पहुंच गया। ऑटो वाले ने ₹१५० लेकर रेलवे स्टेशन छोड़ दिया। सुबह रेलवे स्टेशन पहुंच कर वेटिंग रूम की खाली कुर्सी देख कर मै बैठ गया। बैठते ही आंख लग गई और करीब आधे घंटे बाद आंख खुली। फिर स्टेशन परिसर घूमा वहां की दुकानें और स्टेशन के आस पास के होटलों के बाहर भ्रमण किया। फिर एक ढाबे में चला गया । वहां का मेनू में मुझे मैगी समझ में आया सो सुबह के नाश्ते में मैंने मैगी और चाय ली।

मैगी खाकर दोबारा मै स्टेशन गया। डोरमेट्री में एक बेड किराए पर लिया, सामान लॉकर में रख कर गर्म पानी से पूर्ण स्नान किया । और स्नान के बाद सो गया। १:३० बजे सो कर उठा फिर सामान निकाल कर प्लेटफॉर्म पर चला गया। २:०० बजे वन्दे भारत एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म पर आ गई। उसमे से लोग उतरे फिर ट्रेन का द्वार बंद हो गया। फिर ट्रेन की सफाई की गई। सफाई के बाद २:४५ में ट्रेन का द्वार यात्रियों के लिए खोल दिया गया। सभी यात्री सवार हो गए। मै भी ट्रेन मै सवार हो गया । ३:०० बजे ट्रेन अपने नियत समय से दिल्ली के लिए रवाना हो गई। ट्रेन खुलते ही दोपहर का भोजन आ गया। दोपहर का भोजन कर मै खिड़की से बाहर के दृश्य देखने लगा। फिर ना जाने कब नींद आ गई। नींद खुली तब ट्रेन का कर्मचारी चाय के लिए जगा रहा था । फिर मैंने चाय पिया। रात के करीब ९:०० बज रहे थे । रात का खाना परोसा गया। खाना खत्म करने के बाद आइसक्रीम भी खाने को मिला। आइसक्रीम खाते खाते दिल्ली स्टेशन आ चुका था। ट्रेन में सूचना का प्रसारण हुआ अगला स्टेशन दिल्ली है। सभी यात्रियों ने अपने सामान उतारे और १०:०० बजे स्टेशन आने पर सब उतरने लगे। जब सब उतार गए तो मै मेरे डिब्बे के सबसे पीछे से उतरा। फिर स्टेशन परिसर से मै बाहर निकला । घर की कैब ली और लगभग ११:३० में मै घर आ गया।

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सादा जीवन जीता हूं, चीजों को उनके प्राकृतिक रूप में देखना पसंद है। सबकी सुन कर अपनी करने का मजा ही कुछ अलग है।